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परिचय
नाम बता दूँ आपको
तो काफिर कहेंग़े लोग।
यह कौन रखता है
याद मुझे देखने के बाद॥
कि मैं जात नहीं,
धर्म नहीं, एक इंसान हूँ।
साम्प्रदायिकता से
ऊपर राष्ट्रीयता कि पहचान हूँ॥
इसलिए मैंने ऐसा
नाम चुना है।
पर जिसने भी आज तक
सुना है॥
उसी ने मुँह
बनाया।
मेरी समझ में यह
नहीं आया॥
कि हम क्या लिखते
हैं ? क्या करते हैं ?
ईश्वर से भी नहीं
डरते हैं॥
जिसने हमें
हिन्दू, सिख, इसाई, मुसलमान नहीं
बल्कि एक इंसान
बनाया है।
मेरी समझ में तो
यही आया है।
मेरी समझ में तो
यही आया है।
न कोई अपना है न
कोई पराया है॥
तथाकथित कवि बनने
के बाद, आज।
मैं हूँ
‘यूसुफ’
भारद्वाज॥
न खाता मैं लहसुन
न प्याज।
कैसी आई यह आवाज ?
यूसुफ और
भारद्वाज।
हाँ, क्योंकि मेरी
पत्नी है पारसी।
सुन्दर है मारूति
कार सी॥
बड़ा लड़का है सिख,
छोटा इसाई।
लड़की का नाम रख
दिया है मैंने हमीदा बाई।
कुछ बात समझ में
आई॥
मेरा घर है सर्व
धर्म सम्मेलन।
देखा, यूसुफ और
भारद्वाज में,
कितना है अपनापन॥
इसलिए यूसुफ की
सलाम भारद्वाज की राम-राम।
यह है ईद और
दीवाली एक साथ मनाने का इन्तजाम॥
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